पुत्र मोह/putr moh

माता पिता अपने पुत्रों के मोह जाल में ऐसी फंस जाते हैं ,जैसे किसी मछुआरे की जाल में मछली फिर पुत्र धर्म करें या अधर्म सब शीतल जल के समान मधुली प्रतीत होता है।
ऐसा ही मोह हस्तिनापुर किस सम्राट वीर धृतराष्ट्र ने किया। वे अपने पुत्र से इतना मुंह कर बैठे, कि उसके द्वारा किया गया अधर्म भी धर्म की भांति कोसता रहा ।ऐसा कहां जाता है जब दुर्योधन का जन्म हुआ, तब महात्माओं का कहना था कि इसको मृत्यु को सौंप दो क्योंकि यह कुल नाशक है । दुर्योधन का जन्म कुछ अनुचित काल में हुआ था , तभी उसकी बुद्धि असुरों के समान विनाशक थी और सत्य ही कहा गया है "विनाश काले विपरीत बुद्धि"।
अवश्य ही कुल का विनाश उसके ही हाथों लिखा था ।तभी तो दुर्योधन अधर्म पर धर्म करता आया था। उसने सर्वप्रथम छल का मार्ग चुन अधर्म करना  बाल अवस्था नहीं सीख लिया था । माना द्रोपती ने उसका उपहास गलत किया परंतु फिर भी , उसका अधर्म सर्वोपरि था ।कैसे किसी स्त्री का अपमान करना धर्म का कार्य था ?परंतु पुत्र मोह के कारण , समर्पण के कारण , गर्व के कारण , यह धर्म में परिवर्तित हो गया शायद ! यह विध्वंस ना होता परंतु विडंबना यह है कि धर्म के ज्ञाता युधिष्ठिर भी नीर के समान मोन , महावीर गंगा पुत्र भी मोन थे , कुलगुरु कृपाचार्य भी मोन थे ,महा ज्ञानी विदुर विमान थे।
एक स्त्री की इज्जत दाओ पे धरी थी, उसका अभिमान संकट में था, ज्ञानी वीरों से भरी सभा में धर्म के नाम पर अधर्म का नंगा नाच सा हो रहा था। फिर भी सब मोहन थे मेरे विचार में जितना अधर्म में भागी दुर्योधन था उतनी ही पूरी सभा ।
कैसा पुत्र मोह है जिसके चलते किसी स्त्री का अपमान भरी सभा में होना धर्म का कार्य था । स्त्री तो  स्त्री होती है चाहे दासी ही क्यों ना हो, उसे वेश्या कहने का अधिकार हमें नहीं किसी के चरित्र पर उंगली उठाना हमारे परामर्श को बढ़ाता नहीं बल्कि हमें दुर्बल घोषित करता है।
सूत पुत्र कर्ण पर होते आ रहे जुर्म सही नहीं। परंतु किसी स्त्री को लांछित करना भी धर्म नहीं। शायद उस गुरु की शिक्षा ही प्रश्न जनक है, जो ऐसे शिष्य प्राप्त हुए। और माता-पिता तो शिशु के प्रथम गुरु है उनकी छवि पुत्र में नजर आती है जैसा सिंहासन का लोक धृतराष्ट्र में था वैसा ही उसके पुत्र में , और उस पुत्र से उम्मीद  भी क्या की जा सकती है जो अपने लोग के कारण परमात्मा को बांधी बनाने का विचार भी करें फिर भी पुत्र मोह में पिता मौन रहे और जिस राज्य में कुलवधू का भरी सभा में सब के समीप वस्त्र हरण हो जाए , उस राज्य में कहा ही किसी स्त्री का सम्मान संभव होगा।
अंत में यही कहना चाहूंगी की स्त्री कदर तब भी नहीं थी अब भी नहीं है , और स्त्री के मान और सम्मान के लिए महाभारत जैसे युद्ध हो गए। फिर चाहे पुत्र मोह हो , या मां का विलाप, किसी का भी मुख्य नहीं देखा जाता। बस रक्त की नदियां बहती है, रक्त की नदियां।

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